Wednesday, September 11, 2019

Another Britsh Theft

*Another British theft!*

What have been the greatest thefts of intellectual property?

Meet Rakhal Das Banerji,
a man to whom we owe an explanation.

In the year 1918, a 33 year old Rakhal Das, an officer at the Archeological Survey of India (ASI) was sent to the Sindh Province of undivided India, on a mission to look for Greek Victory Pillars by his boss.

His British boss had a belief that Indians were incapableof reaching the standards of Classical architecture, literature and sculpture all by themselves - and that it all was actually ‘copied’ from the Greco-Roman civilisation.

The existence of a Greek Victory Pillar in the dry beds of Indus, would have given credence to this theory.

*Discovery of a Stupa from Kushana*

Down in Larkana District of Sindh, instead of finding a Greek Victory Pillar - Rakhal Das ended up finding a Buddhist Stupa of the Kushana Period (2nd and 3rd Century BCE).

*The discovery of Mohenjo Daro*

When asked to dig further - out came a 5000 year old city made of baked bricks, which along with Harappa, established the existence of an Indian Civilisation, older than any known in Europe.

*The curious case of a Boss sitting in Shimla*

He wrote back a report about his findings - nothing got published.

He continued excavations between 1918–1922, leading 5 seasons of excavations - writing back reports at regular intervals - nothing got published.

He wrote his final report on Mohenjo-Daro in 1924- He did not even receive an acknowledgement.

*The Transfer - Arrest - The End*

In 1924, Rakhal Das came across an issue of the Illustrated London News, reporting on the exciting discovery of the Mohenjo-Daro, crediting the discovery to his boss.

In the same year, to his utter surprise, Rakhal Das received a transfer order- relieving him of his responsibilities at the excavation sites in Mohenjo-Daro with immediate effect.

In October 1925, an arrest warrantwas issued under his name, for alleged removal of a statue from the Chausath Yogini temple in Jabalpur.

Owing to the case and the allegation, he was immediately put under suspension.

Though the case was eventually dismissed 3 years later, and a departmental enquiry found nothing, his Boss ‘advised’ him to resign.

Rakhal Das Banerji retired from ASI in 1928 - and died 2 years later.

Before his first death anniversary - his boss - Sir John Hubert Marshall, published a book in 3 volumes.

This book established Sir Marshall as the discoverer of Mohenjo-Daro.

Encyclopedia Britannica credits him, for the discoveryof Mohenjo-Daro.

The Oxford University Press credits him for discovery of Mohenjo-Daro.
Major Indian and international publications and even Jawaharlal Nehru’s Discovery of India, credits him for the discovery of Mohenjo-Daro.

Even NCERT in India, credits him as the main guy, who discovered Mohenjo-Daro.

Recently, the India Today Magazine celebrated his 59th Death Anniversary, crediting him for the discovery of Mohenjo-Daro.

Sir Marshall, being the large hearted and awesome boss that he was - didn’t forget to mention Rakhal Das Banerji’s name in the foreward of the book - crediting him as the man, who calculated, how old Mohenjo-Daro ruins were- That’s it.

Most Indian text books today, mention Rakhal Das as a footnote, only a few credit him for the discovery, taking his name, while singing paeans for his boss, Sir John Marshall.

There’s just one small teeny weeny issue in all of this:

- There’s absolutely no evidence of Sir John Hubert Marshall ever visiting the ruins of Mohenjo-Daro in his entire career.

*We need to correct this part of history.....*

https://m.timesofindia.com/city/kolkata/banerji-robbed-of-credit-for-indus-findings/amp_articleshow/59101966.cms

Thursday, September 5, 2019

सिंध प्रांत

सिंध के साम्राज्य में बलूचिस्तान,पंजाब,कश्मीर, दक्षिणी अफगानिस्तान,और गुजरात के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया था,सिंध साम्राज्य की स्थापना 540 ईसवी में दिवाजी राव द्वारा की गयी,राव परिवार के अंतिम शासक सहसी राव द्वितीय थे जिन्होंने अपने चाचा सिलबिज़ की मृत्यु के बाद सत्ता संभाली

राव के दरबार मे 671AD में सिंध के अगले शासक के रूप में उनके भाई चंदर सिलबिज़ की घोषणा हुई जिन्होंने 7 वर्षों तक सिंध पर शासन किया,चंदर के बाद चाचा सिलबिज़ के छोटे पुत्र राजकुमार दाहिर का राजतिलक सिंध के राजा के रूप में हुआ,

सिंध साम्राज्य पर 710 AD के आस पास अरब आक्रमणकारियों ने आक्रमण कर दिया बड़ी मात्रा में लूटपाट,हत्या,धर्म परिवर्तन अत्याचार किये,राज्य का कोष लूटना शुरू किया जो धीरे धीरे सिंध राज्य के पतन का कारण बना,

सिंध के इतिहास के दुखद अंत की शुरुआत तब हुई जब 1843 के आस पास अंग्रेजों के द्वारा सिंध के आखरी राज्य पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया,और 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रजो के जुल्म से बचने व मौत की सज़ा से बचने के लिये सिंध ने अपना हिस्सा अंग्रेजों को दे दिया,

आज भी सिंध प्रांत में सिंध राष्ट्रवाद जीवित है,अपनी पहचान के लिये संघर्ष कर रहा अपने पूर्वजों की पहचान के लिये जिन्होंने अरब आक्रमणकारियों व अंग्रजो से युद्ध किया व उनकी बर्बर यातनाएं भोगी और पाकिस्तान के जुल्म सहे लेकिन घुटनें नही टेके,हार नही मानी.

राजा दाहिर

महान प्रतापी असीमित बलशाली राजा दाहिर की सिंध को बचाने के लिये किया गया भयंकर युद्ध:
दाहिर ने घोषणा कर दी थी कि बेडौइन 
(अरबी खानाबदोश) ले साथ कोई समझौता या बातचीत नही होगी,ये स्पष्ट संदेश था सेना के लिये भी की राष्ट्र की अस्मिता के लिये बलिदान देने का समय आ गया है

मेरा रक्त भी सिंध की इस महान भूमि,जिसमे हज़ारो महान पुरुषों का रक्त मिला हुआ है,सिंध पर अरबों के असफल आक्रमण की शुरुआत 711 ईस्वी में उम्मयद के खलीफा वालिद बिन अब्दुल की अगुवाई में तब तक हुआ जब तक की 713 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम 2 में सिंध पर आक्रमण नही कर दिया,

कासिम की पीढ़ियों ने 100 वर्षों से अधिक समय सिंध पर शासन किया,अरब सेना ईरान के शासक सस्सनिद के सत्ता पतन के बाद सीधे सिंध के संपर्क में आया,और कासिम की अगुवाई में अरब सेना ने 713 ईस्वी तक सिंध पर आक्रमण किया और सफल भी हुआ,

राजा दाहिर ने जीवन की सबसे बड़ी गलती की जब उन्होंने रहम खाकर अपने व्यक्तिगत अरबी जनजाति अलाफी के सेनापति को शरण देकर की जो अरबी जनजाति उम्मयद के प्रतिद्वंद्वी थे,और दाहिर धोखा खा गये, इतिहास ने समय के साथ हमे एक बार और समझा दिया कि ये भरोसे के लायक नही है,

दाहिर को अलाफी की इस मदद की सज़ा अरबों के विश्वासघात के साथ मिली,अलाफी ने उम्मयद को राज्य की सारी गुप्त जानकारी दे दी जिससे उन्हें आक्रमण में आसानी हुई,और अलाफी द्वारा दी गयी गोपनीय रणनीतिक जानकारी की मदद से उम्मयद को सिंध को हराने में मदद मिली,

राजा दाहिर की सेना में 20 हज़ार पैदल सैनिक, 5 हज़ार घुड़सवार सैनिक व 26 हाथियों पर सवार लड़ाके थे जो बिन कासिम की सेना की तुलना में बहुत छोटी थी,कासिम की सेना में 50 हज़ार की संख्या में पैदल,घुड़सवार,व धनुर्धारी सैनिकों से परिपूर्ण थी,

विश्वासघाती अलाफी (जिसे राजा दाहिर ने रहम खाकर सिंध में शरण दी) अपने 500 सैनिकों के साथ उम्मयद की साथ शामिल हो गया व राजा दाहिर के खिलाफ युद्ध किया,उसे जिसने शरण दी बनाया व महान हिंदू धर्म के मूल्यों को दर्शाया,सिंध की लड़ाई 5 दिन चली,

युद्ध के पहले ही दिन कासिम ने रवाद क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और आसपास का पूरा क्षेत्र ही ढह गया,फिर अरब सेना जुइयूर तक पैदल ही आ गयी लगभग दाहिर की सेना के पास तक,उसके बाद सिंध की सेना का भारी नुकसान हुआ,वह भी तब जब युद्ध में राजा खुद मोर्चा संभाले हुए था,

राजा दाहिर शाही हाँथी पर सवार था और अकेला भगवान इंद्र की सेना के समान दुश्मन सैनिकों पर तीरों की बौछार कर रहा था,दुश्मन सेना में हड़कंप मच गया,दाहिर ने अकेले बेडौइन के हज़ारों सैनिकों को मार गिराया मरने वालों में दुश्मन सेना का सेनापति महरीन बिन तब्बू भी शामिल था,

युद्ध के अंतिम दिन अरब सेना द्वारा राजा दाहिर को उसके भाई दहिसरन,चचेरे भाई जयबिन व प्रमुख सेनापति व 2 भतीजों के साथ गिरफ्तार कर लिया वह युद्ध मे अपने अधिकांश सैनिकों के मारे जाने के बाद बचे हुए सैनिकों के साथ अरबों खिलाफ युद्ध का नेतृत्व कर रहा था,दाहिर नें अदम्य साहस का दिखाया,

दुश्मनों ने हाथी पर बैठे दाहिर को घेर कर घायल कर दिया और उसका वध कर उसका सर् काट कर बिन कासिम को भेंट किया,दाहिर की सेना के सभी सेनापति व उसके भाई बंधु राष्ट्र की रक्षा करते करते अरबो के हाथों शहीद हुए व अपने राष्ट्र सिंध की पावन मिट्टी में समा गये,

बाद में दमिश्क को खलीफा के पास भेज दिया,कहा जाता है,अरबी सैनिकों ने सिंध की 30 जवान लड़कियों जिनमे राजा दाहिर की 2 पुत्रियां राजकुमारी पुरमल देवी व राजकुमारी सूरज देवी भी शामिल थी,को बंदी बनाकर खलीफा की खिदमत में उसके हरम में भेज दिया,बहुत सी महिलाओं ने जुल्म से बचने को जौहर किया

आत्मघाती नैतिकता का पाठ

महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छू जाये... !!

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था .... ! 
युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र , मुकुट , टूटे शस्त्र , टूटे रथों के चक्के , छज्जे आदि बिखरे हुए थे ,और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... !

गिद्ध,कुत्ते,सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था अकेला .... !
तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची ,"प्रणाम पितामह" .... !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , " आओ देवकीनंदन .... ! स्वागत है तुम्हारा .... !! 

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !!

कृष्ण बोले , "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले , " पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव .... ? 
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !

कृष्ण चुप रहे .... !

भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव .... ? 
बड़े अच्छे समय से आये हो .... ! 
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह .... ! 

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न .... ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ... मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह .... ईश्वर नहीं ...."

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... ! बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा ,

पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले .... " कहिये पितामह .... !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"

"किसकी ओर से पितामह .... ?पांडवों की ओर से .... ?"
"कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था...आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार,दुःशासन की छाती का चीरा जाना,

ठीक था क्या..?यह सब उचित था क्या..?"
इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह..! 
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया.!! 
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम,उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाल अर्जुन.. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!

"अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... ! 
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"

"तो सुनिए पितामह .... ! 
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ..! 
वही हुआ जो हो होना चाहिए ..!"

" यह तुम कह रहे हो केशव...? 
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....? यह क्षल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा , फिर यह उचित कैसे गया....?

"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... ! 
हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !! 
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !

हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"

" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... ! 
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!

तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण और कुम्भकर्ण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!

इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

"तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ? 
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ? 
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"

" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... ! 
वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... ! 
जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों , तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह .... !

तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय .... ! भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ..... !!"

"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ? 
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"

"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... ! 
सब मनुष्य को ही करना पड़ता है .... ! 
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... ! 
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ? 
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ? 
यही प्रकृति का संविधान है .... !

युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से..यही परम सत्य है..!!"
भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे..! 
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... ! 
उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है..कल सम्भवतः चले जाना हो..अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था ...!

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों , तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है .... !!
🙏🙏🙏 ....?"

Sunday, September 1, 2019

इंदिरा खान (गांधी) का इतिहास

📕
इंदिरा गाँधी को एक बहुत ही जिम्मेदार, ताकतवर और राष्ट्रभक्त महिला बताया है,,,

इसकी कुछ कड़वी हकीकत से आपको रुबरु करवा दें,,,

इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू राजवंश को अनैतिकता को नयी ऊँचाई पर पहुचाया,,,

बौद्धिक क्षमता की धनी~ इंदिरा को ऑक्सफोर्ड
विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था,

लेकिन वहाँ से जल्दी ही पढ़ाई में खराब प्रदर्शन
के कारण बाहर निकाल दी गयी,

उसके बाद उसको शांति निकेतन विश्वविद्यालय में भर्ती कराया गया था,

लेकिन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें उसके दुराचरण के लिए बाहर कर दिया,

शान्ति निकेतन से बाहर निकाले जाने के बाद इंदिरा अकेली हो गयी,

राजनीतिज्ञ के रूप में पिता राजनीति के साथ व्यस्त था,

और

मां तपेदिक से स्विट्जरलैंड में मर रही थी,,,

उनके इस अकेले पन का फायदा फ़िरोज़ खान नाम के
व्यापारी ने उठाया,

फ़िरोज़ खान मोतीलाल नेहरु के घर पर महंगी विदेशी शराब की आपूर्ति किया करता था,,,

फ़िरोज़ खान और इंदिरा के बीच प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो गए,,,

महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल डा० श्री प्रकाश नेहरू ने चेतावनी दी,

कि फिरोज खान के साथ अवैध संबंध बना रहा था,,,

फिरोज खान इंग्लैंड में तो था और इंदिरा के प्रति उसकी बहुत सहानुभूति थी,

जल्द ही वह अपने धर्म का त्याग कर, एक मुस्लिम महिला बनीं और लंदन के एक मस्जिद में फिरोज खान से उसकी शादी हो गयी,

इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू ने नया नाम मैमुना बेगम रख लिया,,,

उनकी मां कमला नेहरू इस शादी से काफी नाराज़ थी, जिसके कारण उनकी तबियत और ज्यादा बिगड़ गयी,,,

नेहरू भी इस धर्म रूपांतरण से खुश नहीं थे, क्योंकि इससे इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना खतरे में आ गयी तो,

नेहरू ने युवा फिरोज खान से कहा कि अपना उपनाम खान से गांधी कर लो,

परन्तु इसका इस्लाम से हिंदू धर्म में परिवर्तन के साथ
कोई लेना~देना नहीं था,

यह सिर्फ एक शपथ पत्र द्वारा नाम परिवर्तन का एक
मामला था, और फिरोज खान फिरोज गांधी बन गया है,

हालांकि यह बिस्मिल्लाह शर्मा की तरह एक असंगत नाम है,

दोनों ने ही भारत की जनता को मूर्ख बनाने के लिए नाम बदला था,

जब वे भारत लौटे, एक नकली वैदिक विवाह जनता के उपभोग के लिए स्थापित किया गया था,,,

इस प्रकार, इंदिरा और उसके वंश को काल्पनिक नाम
गांधी मिला,,,

नेहरू और गांधी दोनों फैंसी नाम हैं,,,

जैसे एक गिरगिट अपना रंग बदलती है, वैसे ही इन लोगो ने अपनी असली पहचान छुपाने के लिए नाम बदले,,,

के.एन.राव की पुस्तक "नेहरू  राजवंश" (10:8186092005 ISBN) में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है संजय गांधी फ़िरोज़ गांधी का पुत्र
नहीं था, जिसकी पुष्टि के लिए उस पुस्तक में अनेक
तथ्यों को सामने रखा गया है,

उसमें यह साफ़ तौर पे लिखा हुआ है कि संजय गाँधी
एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस नामक सज्जन का बेटा था,

दिलचस्प बात यह है की एक सिख लड़की मेनका का विवाह भी संजय गाँधी के साथ मोहम्मद यूनुस के घर में ही हुआ था,

मोहम्मद यूनुस ही वह व्यक्ति था जो संजय गाँधी की विमान दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा रोया था,,,

यूनुस की पुस्तक  "व्यक्ति जुनून और
राजनीति" (persons passions and politics)
(ISBN-10 : 0706910176) में साफ़ लिखा हुआ है की संजय गाँधी के जन्म के बाद उनका खतना पूरे मुस्लिम रीति रिवाज़ के साथ किया गया था,

कैथरीन फ्रैंक की पुस्तक "the life of Indira Nehru Gandhi" (ISBN : 9780007259304) में इंदिरा गांधी के अन्य प्रेम संबंधो के कुछ पर प्रकाश डाला है,

यह लिखा है, कि इंदिरा का पहला प्यार शान्तिनिकेतन
में जर्मन शिक्षक के साथ था,,,

बाद में वह एम.ओ मथाई (पिता के सचिव) धीरेंद्र ब्रह्मचारी (उनके योग शिक्षक) के साथ और दिनेश सिंह
(विदेश मंत्री) के साथ भी अपने प्रेम संबंधो के लिए
प्रसिद्ध हुई,,,

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी के मुगलों के
लिए संबंध के बारे में एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया अपनी पुस्तक~

"profiles and letters" (ISBN : 8129102358) में किया,

यह कहा गया है, कि 1968 में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री के रूप में अफगानिस्तान की सरकारी यात्रा पर गयी थी,,,

नटवर सिंह एक आई एफ एस अधिकारी के रूप में इस दौरे पे गए थे,

दिन भर के कार्यक्रमों के होने के बाद इंदिरा गांधी को शाम में सैर के लिए बाहर जाना था,

कार में एक लंबी दूरी जाने के बाद, इंदिरा गांधी बाबर
की कब्रगाह के दर्शन करना चाहती थी,

हालांकि यह इस यात्रा कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया,,,

अफगान सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी इस इच्छा पर
आपत्ति जताई पर इंदिरा अपनी जिद पर अड़ी रही,,,

अंत में वह उस कब्रगाह पर गयी,

यह एक सुनसान जगह थी,,,

वह बाबर की कब्र पर सर झुका कर आँखें बंद करके खड़ी रही और नटवर सिंह उसके पीछे खड़े थे,

जब इंदिरा ने उसकी प्रार्थना समाप्त कर ली तब वह मुड़कर नटवर से बोली,

आज मैंने अपने इतिहास को ताज़ा कर लिया,
"Today we have had our brush with history"

यहाँ आपको यह बता दे, कि बाबर मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक था,,,

और नेहरु खानदान इसी मुग़ल साम्राज्य से उत्पन्न हुआ,,,

इतने सालों से भारतीय जनता इसी धोखे में है की नेहरु
एक कश्मीरी पंडित था,,,

जो की सरासर गलत तथ्य है,,,

इस तरह इन नीचो ने भारत में अपनी जड़े जमाई जो आज एक बहुत बड़े वृक्ष में तब्दील हो गया है,

जिसकी महत्वाकांक्षी शाखाओं ने माँ भारती को आज बहुत जख्मी कर दिया है बाकी देश के प्रति यदि आपकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती हो,

तो अब आप लोग ''निःशब्द'' ना बनियेगा,

इसे फैला दीजिए हर घर में!!!

वन्देमातरम,,,

रॉबर्ट और प्रियंका की शादी सन् 1997 में हुई थी, लेकिन अगर कोई रॉबर्ट को ध्यान से देखे तो यह बात सोचेगा कि सोनिया ने रॉबर्ट जैसे कुरूप और साधारण व्यक्ति से प्रियंका की शादी कैसे करवा दी?

क्या उसे प्रियंका के लिए कोई उपयुक्त वर नहीं मिला, और यह शादी जल्दी में और चुपचाप क्यों की गयी???

वास्तव में सोनिया ने रॉबर्ट से प्रियंका की शादी अपनी पोल खुलने के डर से की थी,,,

क्योंकि जिस समय सोनिया इंगलैंड में एक Five star Hotel में बार गर्ल थी,

उसी समय उसी जगह रॉबर्ट की माँ मौरीन (Maureen) भी यही काम करती थी??

मौरीन को सोनिया और माधव राव की रास~लीला की बात पता थी,

जब वह उसी केंटीन सोनिया उनको शराब पिलाया करती थी,

मौरीन यह भी जानती थी की किन किन लोगों के साथ सोनिया के अवैध सम्बन्ध थे,

जब सोनिया राजीव से शादी करके दिल्ली आ गयी, तो कुछ समय बाद मौरीन भी दिल्ली में बस गयी,,,

मौरीन जानती थी कि सोनिया सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है,

क्योंकि जो भी व्यक्ति उसके खतरा बन सकता था सोनिया ने उसका पत्ता साफ कर दिया,

जैसे~  संजय, माधव राव, पायलेट, जितेन्द्र प्रसाद, योगी,

यहाँ तक लोग तो यह भी शक है कि राजीव गांधी की हत्या में सोनिया का भी हाथ है,

वर्ना वह अपने पति के हत्यारों को माफ़ क्यों कर देती?

चूँकि मौरीन का पति और रॉबर्ट का पिता राजेंद्र वडरा पुराना जनसंघी था,

और सोनिया को डर था कि अगर अपने पति के दवाब ने मौरीन अपना मुंह खोल देगी तो मुझे भारत पर हुकूमत करने और अपने नालायक कुपुत्र राहुल को प्रधानमंत्री बनाने में सफलता नहीं मिलेगी,,,

इसीलिए सोनिया ने मौरीन के लड़के रॉबर्ट की शादी प्रियंका से करवा दी,

,,,,,,,,,शादी के बाद~की कहानी,,,,,,,,,

राजेंद्र वडरा के दो पुत्र, रिचार्ड और रॉबर्ट और एक
पुत्री मिशेल थी,,,

और प्रियंका की शादी के बाद सभी एक एक कर मर गए,या मार दिए गए,,,

जैसे, मिशेल ( Michelle )सन् 2001 में कार दुर्घटना में मारी गयी,

रिचार्ड ( Richard )ने सन् 2003 में आत्मह्त्या कर ली,

और प्रियंका के ससुर सन् 2009 में एक मोटेल में मरे हुए पाए गए थे,,,

लेकिन इनकी मौत के कारणों की कोई जाँच नहीं कराई
गयी, और इसके बाद सोनिया ने रॉबर्ट को राष्ट्रपति और
प्रधान मंत्री के बराबर का सुरक्षा व अन्य दर्जा इनाम के तौर पर दे दिया,

तब इस अधिकार को जिस रॉबर्ट को कोई पड़ोसी भी नहीं जानता था,

उसने मात्र आठ महीनो में करोड़ों की संपत्ति बना ली,

और कई कंपनियों का मालिक बन गया,

साथ ही सैकड़ों एकड़ कीमती जमीने भी हथिया ली,,,

क्या ये  जानकारी देश के लोगों को होना चाहिये, तो कृपया जरुर शेयर करें,,,✍

जिहाद का इलाज

सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद  एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं। लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।

एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी। भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।

तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला। उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।

आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।
                               
25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे... तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला---
"महाराज, हमें इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।"

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।"

"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले-
"किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। "

तक्षक ने कहा-
*"मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"*

"पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर"

"राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।"

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।

अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते, सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था...

उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था। सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"

*इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।*

*तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा*