Sunday, January 6, 2019

पांचवां कॉलम: पेपर हवाई जहाज

साभार: इंडियन एक्सप्रेस में तवलीन सिंह द्वारा लिखित का हिंदी अनुवाद

Updated: 6 जनवरी, 2019 8:53:59 पूर्वाह्न

संसद में राफेल सौदे पर बहस शर्मनाक रही है। निम्नतम क्षण तब आया जब वित्त मंत्री के  बोलते वक्त, कांग्रेस के सांसदों ने ट्रेज़री बेंच पर कागजी हवाई जहाज फेंकने शुरू कर दिए।  संसद अध्यक्ष को एक स्कूली शिक्षक के स्वर में कहना पड़ा, "क्या आपने बचपन में पर्याप्त कागज के विमान नहीं उड़ाये थे? क्या अब आप वयस्क नहीं हो?",जबकि उन्हें थोड़ी कम कृपा दर्शानी चाहिये थी और लोकसभा में बहस को हास्यास्पद स्तर तक ले जाने के लिए,उपद्रवी सांसदों को सदन से बाहर करना चाहिए था।

कांग्रेस अध्यक्ष ने उसके बाद तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह घोषणा की कि प्रधानमंत्री बहस से भाग गए हैं। उन्होंने बड़ी गंभीरता से यह घोषणा की थी कि मैं उनसे बहस करने के लिए तैयार हूं,पर वे संसद का सामना करने में बहुत डरते हैं। यहाँ आपको यह बता दें कि प्रधानमंत्री का यह विशेषाधिकार होता है कि, वे किस बहस में भाग लेना चाहते है। यह निश्चित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति,जिसके पास लोकसभा में इतनी कम सीटें हों, की स्थिति नहीं है कि, वह प्रधानमंत्री को आदेश दे सके। वे आधिकारिक रूप से विपक्ष के नेता भी नहीं हैं। लेकिन,जब से राहुल गांधी ने पिछले महीने तीन महत्वपूर्ण हिंदी हार्टलैंड राज्यों को जीतने में कामयाबी हासिल की है,उन्होंने यह ध्यान दिए बिना,कि वह एक कागज़ी हवाई जहाज पर हैं,ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी है।

राहुल इस वर्ष भारत के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं,अभी तक ऐसे कोई प्रबल संकेत नहीं मिले हैं। मीडिया उन्हें,उनकी झूठी गाथा से बेवकूफ बना रही है। वे मोदी के "एकमात्र चुनौती" के रूप में महत्वपूर्ण राजनीतिक पत्रिकाओं के कवर पर छाए हुए हैं । प्रख्यात राजनैतिक टिप्पणीकारों ने उनके "महान परिवार और उनकी महान विरासत" का स्तुति गान लिखना प्रारंभ कर दिया है। यह अवमाननात्मक राजनैतिक विश्लेषण है,लेकिन हमारे इस राजसी वंश के बारे में कुछ तो ऐसा है कि,जो अच्छे-अच्छे पत्रकारों को,चरण वंदना की हद तक चाटुकार,के निम्न स्तर तक ले जाता है।

इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष ने,अपने राजनैतिक जीवन में पहली बार ऊंची उड़ान भरने के उत्साह के साथ नशे में,एक महिला पत्रकार का अपमान किया,जिसे इस वर्ष प्रधानमंत्री ने पहला साक्षात्कार दिया। स्मिता प्रकाश ने नरेंद्र मोदी से कुछ कठिन सवाल पूछे, लेकिन राहुल गांधी की नज़र में,वे "लचीली" थी।

इस बीच,अपने कई युद्धरत शैली,पर अमूमन अप्रसांगिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में,वे ऐसा व्यवहार करना जारी रखते हैं मानो,राफेल सौदा,मोदी को वैसे ही सत्ताच्युत कर देगा जैसे बोफर्स कांड ने उनके पिताश्री को एक बार सत्ताच्युत किया था। पर वे यह भूल जाते हैं कि भले ही वे,जब भी सार्वजनिक होते हैं,बार-बार यह दोहराते रहें कि "देश का चौकीदार चोर है",आम भारतीय ऐसा कोई संकेत नहीं देता कि वे मोदी को भ्रष्ट समझने या मानने लगे हैं।

राफेल और बोफोर्स के बीच अंतर यह है कि, बोफोर्स के मामले में अभी भी कांग्रेस द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया जा सका है कि,बोफोर्स के रिश्वत के पैसे,ओतावियो और मारिया क्वात्रोच्ची के सूचकांक स्विस खातों में कैसे और क्यों पहुंचे थे। एकमात्र कारण जो समझ में आता है कि,उन्होंने बोफोर्स को अपनी तोपें, एक प्रधान मंत्री,जिनकी पत्नी उनके सबसे करीबी दोस्तों में से एक थी,को बेचने में सहायता की। उन्होंने एक साथ छुट्टियां मनाईं, सोनिया गांधी के माता-पिता जब दिल्ली आए तो,क्वात्रोच्चियों के साथ रहे और कांग्रेस के दो बड़े प्रधानमंत्रियों ने क्वात्रोच्चियों को भारत से भागने में मदद की। राफेल सौदे में ऐसा कुछ नहीं हुआ है। जब 2014 के चुनाव अभियान में राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ने "अंबानी-अडानी" का शोरगुल कर मोदी पर आक्रमण किया था, तो जिस अंबानी की बात कर रहे थे,वे दूसरे वाले अम्बानी थे। किसी भी संदर्भ में, प्रधानमंत्री पर यह आरोप जड़ना कि, वे व्यक्तिगत रूप से पेरिस गए और डसॉल्ट पर जोर डाला कर अनिल अंबानी को इस सौदे में विशेष लाभ दिलवाया,गैर जिम्मेदाराना है। यह वास्तव में भारत राष्ट्र को नीचा दिखाता है। यदि उनके हस्तक्षेप के कोई प्रमाण है, तो पहले उसे प्रस्तुत करें।

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